
राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के ज़रिए वायु प्रदूषण को कम करने में देश की प्रगति के दावों के बावजूद भारत लक्ष्य से बहुत पीछे है, और पिछले साल दुनिया के 10 सबसे ज्यादा प्रदूषित देशों में से एक था. लेकिन यह समस्या पिछले कुछ वर्षों में सरकारी समितियों, गैर-सरकारी संगठनों और शोध संस्थानों द्वारा की गई कई सिफारिशों को लागू नहीं किए जाने से और भी जटिल हो गई है.
उदाहरण के लिए, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन पर संसदीय स्थायी समिति की एक रिपोर्ट ने 2023 में केंद्र को एनसीएपी के निगरानी ढांचे पर फिर से विचार करने की सिफारिश की थी. इस रिपोर्ट में परिमाण के डेटा के अलावा गुणात्मक डेटा की ज़रूरत, और मापदंडों के रूप में सार्वजनिक अनुभव और सामाजिक ऑडिट को शामिल करने की महत्ता पर रोशनी डाली थी. लेकिन इन मापदंडों में बदलाव लाया जाना अभी बाकी है.
न्यूज़लॉन्ड्री ने अधिकांशतः 2022 के बाद की गई ऐसी कई सिफारिशों का ऑडिट किया, और पाया कि कई को अभी भी लागू किया जाना बाकी है.
#1: वायु के गुणवत्ता मानकों की जस की तस स्थिति
2022 में केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय की देखरेख में, सीएसआईआर-राष्ट्रीय विज्ञान संचार और नीति अनुसंधान संस्थान ने राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों में सख्त संशोधनों की सलाह दी थी. लेकिन वे 2009 से बदले नहीं गए हैं, और 2021 में संशोधित डब्ल्यूएचओ वायु गुणवत्ता मानकों की तुलना में बहुत ढीले-ढाले हैं. मसलन, एनएएक्यूएस के तहत PM2.5 कणों का मानक 40 µg/m3 है जबकि डब्ल्यूएचओ इसे 5 µg/m³ तक सीमित रखना चाहता है.
इस रिपोर्ट में ग्रामीण क्षेत्रों में निगरानी स्टेशनों के दायरे को फैलाने की भी सिफारिश की गई है. लेकिन केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वेबसाइट नवंबर 2024 तक, 26 गांवों में 26 स्टेशनों का ग्रामीण नेटवर्क ही दिखाती है. लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर के अनुसार, 2020 में भी यह संख्या 26 ही थी, जो इनके विस्तार की धीमे होने की तरफ इशारा करती है.
सेंसर व्यापक वायु गुणवत्ता मॉनिटर या (एसएएक्यूएम यानी - सेंसर परिवेशी वायु गुणवत्ता मॉनिटर) नदारद हैं. इनकी सिफारिश, आईआईटी दिल्ली के सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंसेज एंड सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर रिसर्च ऑन क्लीन एयर द्वारा 2022 की रिपोर्ट में और 2023 में एक निजी थिंक टैंक सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट एनालिसिस द्वारा की गई थी. महाराष्ट्र में एक पायलट प्रोजेक्ट के तहत नवंबर 2020 से मई 2021 के बीच, मौजूदा निरंतर व्यापक वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशनों के साथ-साथ चार भारतीय कंपनियों द्वारा निर्मित कुल 40 एसएएक्यूएम लगाए गए थे. इस परियोजना और एसएएक्यूएम मॉनीटरों को 2023 में अस्वीकार कर दिया गया.
पिछले साल आईआईटी दिल्ली के ट्रिप-सेंटर की एक रिपोर्ट में बताया गया कि अधिकांश शहरों में निगरानी स्टेशनों की संख्या, अनुशंसित संख्या से कम है. सीपीसीबी की वेबसाइट पर बताए गए देश भर में लगे 562 एसएएक्यूएम स्टेशनों में से, सेंट्रल कंट्रोल रूम फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट के अनुसार केवल 473 ही पूरी तरह से चालू हैं. इतना ही नहीं, 186 शहरों में केवल एक निगरानी स्टेशन उपलब्ध है.
2019 में, 15वें वित्तीय आयोग ने एयरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ की निगरानी की सिफारिश की थी, जो कि हवा के एक कॉलम के भीतर धुएं और समुद्री नमक जैसे एरोसोल का एक माप होता है. 2023 में, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने लोकसभा को बताया कि एओडी डाटा का उपयोग “नियामक उद्देश्यों के लिए” नहीं किया जा सकता है.
#2: उज्ज्वला योजना में लंबित आवेदनों की संख्या बहुत ज्यादा है
जहरीली हवा से निपटने के लिए स्वच्छ ईंधन एक अहम रणनीति है. प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना शुरू किए जाने के पीछे यह भी एक कारण था, जिसका उद्देश्य गरीब परिवारों को एलपीजी सिलेंडर उपलब्ध कराना है. ताकि लकड़ी, कोयला और गोबर जैसे खाना पकाने के पारंपरिक ईंधनों के इस्तेमाल से जुड़े गंभीर जोखिमों को कम करके, परिवारों के स्वास्थ्य की सुरक्षा की जा सके.
लेकिन इसमें आवेदनों की संख्या बहुत ज्यादा है. 2022-23 में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस पर स्थायी समिति की एक रिपोर्ट में 8.4 लाख लंबित आवेदनों की ओर इशारा किया गया था. 1 जनवरी 2025 तक, देश भर में 29.02 लाख आवेदन लंबित थे. राज्यसभा में दिए गए एक उत्तर के अनुसार इन लंबित आवेदनों को निपटाने के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की गई है.
#3: गैस आधारित संयंत्रों का कम उपयोग
एनसीआर क्षेत्र में गैस आधारित बिजली क्षमता का फ़िलहाल उपयोग कम हो रहा है. सीआईआई-नीति आयोग की स्वच्छ ईंधन रिपोर्ट के अनुसार, इन संयंत्रों में दिल्ली की बिजली की 50 फीसदी मांग को पूरा करने की क्षमता है, लेकिन फिर भी वे फ़िलहाल केवल 20 फीसदी आपूर्ति ही करते हैं. सरकार के अनुमानों से पता चलता है कि इस समय भारत भर में केवल 62 गैस-आधारित बिजली संयंत्र हैं. और पिछले साल, केंद्रीय मंत्री आरके सिंह ने मनी कंट्रोल को बताया था कि इनमें निवेश बढ़ाने की कोई योजना नहीं है. बिजली पैदा करने के लिए स्वच्छ ईंधन की आवश्यकता को 2019 में नीति आयोग की रिपोर्ट में भी दोहराया गया था, जिसमें स्वच्छ उद्योग जगत के लिए एक एक्शन प्लान पर जोर दिया गया था.
2019 में, 15वें वित्तीय आयोग ने बिजली उत्पादन के लिए डंपसाइट्स पर मीथेन गैस, जो कचरे की बड़ी मात्रा से निकने वाली एक हानिकारक गैस है, को जमा की सिफारिश की थी. पर दिल्ली में फ़िलहाल कोई बायोमीथेनेशन संयंत्र नहीं है, साथ ही पूरे भारत में ऐसे केवल 126 संयंत्र ही हैं, जिनकी संयुक्त क्षमता केवल 4,338 टन प्रतिदिन है.
#4: कचरे की 30 फीसदी से कम डंपसाइट, उसका उपचार कर रही हैं
दिसंबर 2022 में, NGT द्वारा गठित एक पैनल ने सिफारिश की थी कि कचरा के प्रबंधन में कचरे के उत्पादन को सही ढंग से मापने, अलग किए गए कचरे को 100 प्रतिशत घर-घर जाकर इकट्ठा करने को सुनिश्चित करने, कचरे से उपयोगी तत्व निकालने और पुनर्चक्रण को बढ़ावा देने, लैंडफिल में नए कचरे के डाले जाने को कम करने और पहले के कचरे का पूरी तरह से निवारण या उपचार करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. लेकिन सरकारी अनुमानों के अनुसार, देश भर में 2,425 डंपसाइटों में से केवल 697 में ही निवारण का काम पूरा हो पाया है.
#5: थर्मल प्लांट समय सीमा से चूक जाते हैं
थर्मल पावर प्लांट वायु प्रदूषण का एक और प्रमुख स्रोत है. हालांकि नीति आयोग द्वारा समर्थित राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान की दिसंबर 2024 की रिपोर्ट कहती है कि वर्तमान में भारत में कोई वायु गुणवत्ता निगरानी नेटवर्क नहीं है, जो सही तरीके से से टीपीपी से होने वाले उत्सर्जन के असर का आकलन करने के लिए डिज़ाइन किया गया हो. रिपोर्ट में एक अतिरिक्त नेटवर्क स्थापित करने, या मौजूदा राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम में कुछ मापदंडों को जोड़ने की सिफारिश की गई थी. इन मापदंडों में मौलिक सल्फर, पार्टिकुलेट सल्फेट और नाइट्रेट शामिल थे, लेकिन इन्हें अभी तक राष्ट्रीय वायु निगरानी कार्यक्रम सूची में नहीं जोड़ा गया है.
रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया कि "संबंधित प्राधिकरण द्वारा टीपीपी में एफजीडी (फ्लू गैस डिसल्फराइजेशन) की स्थापना के बारे में उचित निर्णय लिया जा सकता है, यह देखते हुए कि परिवेशी एसओ2 सांद्रता निर्धारित सीमा से काफी कम है.”
2015 में नरेंद्र मोदी सरकार ने भारत भर में सभी कोयला-चालित संयंत्रों में फ्लू गैस डिसल्फराइजेशन, जो कि एसओ2 उत्सर्जन को नियंत्रित करने की एक प्रक्रिया है, को स्थापित करने के लिए दो साल की समय सीमा तय की थी. लेकिन अब तक ऐसे प्रतिष्ठानों के लिए निर्धारित कुल 537 इकाइयों में से केवल 44 में ही एफजीडी को स्थापित किया जा सका है.
#6: निगरानी प्रकोष्ठ मौजूद नहीं
कम कार्बन प्रौद्योगिकी पर कई मंत्रालयों की समिति की 2022 में जारी रिपोर्ट में, मध्यम, छोटे और सूक्ष्म स्तर के औद्योगिक स्टील क्षेत्र की ऊर्जा कार्यक्षमता और CO2 उत्सर्जन की निगरानी के लिए ऊर्जा निगरानी प्रकोष्ठ स्थापित करने की सिफारिश की गई थी. यह निगरानी प्रकोष्ठ भी अभी तक चालू नहीं हुआ है.
#7: इलेक्ट्रिक चार पहिया वाहनों पर यू-टर्न
ईवी उद्योग पर संसदीय स्थायी समिति की 2023 की रिपोर्ट में सिफारिश की गई, कि केंद्र द्वारा चौपहिया वाहनों की श्रेणी में मंजूर इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या बढ़ाए. साथ ही भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों के तेजी से अपनाने और विनिर्माण 2 (FAME II) योजना के तहत, निजी इलेक्ट्रिक चार पहिया वाहनों को शामिल किया जाए, जिसमें वाहन की लागत और बैटरी क्षमता के आधार पर सीमा तय हो.
समिति ने यह भी बताया कि FAME II के अंतर्गत शुरुआती लक्ष्य, 55 हजार इलेक्ट्रिक चौपहिया वाहनों में मदद करना था. लेकिन इसमें बदलाव करके इसे 11 हजार कर दिया गया. इसके बाद पिछले साल FAME II की जगह PM E-DRIVE योजना ने ले ली, जिसमें एक श्रेणी के तौर पर इलेक्ट्रिक चौपहिया वाहनों का कोई ज़िक्र ही नहीं है.
इस योजना में इलेक्ट्रिक दोपहिया, तिपहिया, एंबुलेंस, ट्रक और अन्य उभरती हुई ईवी श्रेणियों के लिए सब्सिडी और मांग की हौसला अफ़ज़ाई जैसे घटकों का ज़िक्र है. पर्यावरणविद् जय धर गुप्ता का कहना है, "ईंधन जलाकर चलने वाले वाहनों के समर्थक इसमें भूमिका निभा सकते हैं, क्योंकि वे नुकसान नहीं उठाना चाहते. इससे पहले कि यह एक महत्वपूर्ण मुकाम पर पहुंच पाता, इलेक्ट्रिक चौपहिया वाहनों के लिए प्रोत्साहन को बहुत जल्दी वापस ले लिया गया."
#8: बायोमास पेलेट लक्ष्य से पीछे
2023-24 में, ऊर्जा पर स्थायी समिति की रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि भारत में बायोमास पेलेट, ईंधन के रूप में इस्तेमाल होने वाला संपीड़ित कार्बनिक कचरा, के लिए ज़रूरी विनिर्माण करने की क्षमता 1 लाख टन प्रतिदिन है, लेकिन इस समय यह लगभग 7 हजार टन प्रतिदिन ही है. 1 लाख टन प्रतिदिन का लक्ष्य भी 2023 में संशोधन के बाद भारत की बायोमास नीति के हिसाब से तय किया गया है. अक्षय ऊर्जा मंत्रालय द्वारा बायोमास पेलेट निर्माण संयंत्रों की स्थापना पर ज़ोर देने वाले बायोमास कार्यक्रम के बावजूद हालात ऐसे हैं.
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर के शोधकर्ता मनोज कुमार ने कहा, "दिल्ली में भी कई पार्टियां प्रदूषण को किसी भी प्रतिशत तक कम करने का दावा करती हैं, लेकिन ये सब फ़िलहाल सिर्फ़ एजेंडा है. ये सभी सिफारिशें राजनीतिक एक दूसरे पर इलज़ाम लगाने के खेल में कहीं खो जाती हैं. अगर आपने कुछ वादे किए हैं, तो आपको उन पर अमल करना चाहिए."
न्यूज़लॉन्ड्री ने इस रिपोर्ट में उल्लेखित सभी मंत्रालयों से संपर्क किया. उनकी ओर से कोई भी प्रतिक्रिया मिलने पर इस रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा.
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यह लेख वायु प्रदूषण से निपटने के लिए एक सहयोगात्मक अभियान का हिस्सा है. यहां बताया गया है कि आप ‘हवा का हक’ कैंपेन में कैसे शामिल हो सकते हैं. इस अभियान को आगे बढ़ाने के लिए यहां क्लिक करें.
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